डिजिटल दुनिया में धर्म का बदलता स्वरूप


वैदिक काल में ज्ञान देने का जो काम ऋषि-मुनि करते थे वो अब हमारे सोशल मीडिया चैनल कर रहें हैं। ये आपको बहुत हद तक ये बतलाने में सफल रहे हैं कि आज के बदलते डिजिटल दुनिया में अपने ज्ञान को अपडेटएड कैसे रखें और इसका प्रतिस्पर्धा के दौर में क्या महत्व है।

स्मार्टफोन का उपयोग केवल सेल्फी, म्यूजिक और पोर्न तक सीमित नहीं है। अब किसी विषय के बारे में कोई सवाल आपके दिमाग में आता है तो Google करें या इसे दोस्तों व परिवार के सदस्यों से व्हाट्सएप्प पर पूछें। इसे YouTube पर भी देख सकते हैं। जब कोई चीज आपकी रुचि को आकर्षित करती है तो उसके बारे में खोज करना न भूलें। अध्ययन करें, सीखें, समझें, जानें एवम इस तरह से अपने ज्ञान को उभरने दें। हमें बस अपनी पुरानी स्कूल-कॉलेज की शिक्षा व्यवस्था पर भरोसा नही करना चाहिए। अपने खूबसूरत मस्तिष्क को समय के साथ जरूरत के अनुसार उपयोग में लाना जरूरी है।


हम सभी जानते हैं कि गला-काट प्रतियोगिता के कारण किस चीज़ का चलन बढ़ रहा है। यहां ज्यादातर बेगार लोग पैसे का नाम लेंगें लेकिन वास्तव में यह है कि कैसे आप ज्ञान का उपयोग अपने जुनून से जुड़ने और डिस्कनेक्ट होने के समय में करते हैं। एक निश्चित समय के लिए सपनों के गुलामी से बाहर होकर अपने मस्तिष्क को फिर से ऊर्जा भरने के लिए कैसे अपने अहंकार को आहार देना, स्वादिष्ट भोजन, लड़ाई-झगड़े तथा अन्य मौलिक क्रियाएँ के अलावा और किस तरह से खुद को आराम देते हैं।

स्मार्टफोन ने बेरोज़गारी को बेगारी में बदल दिया है। किसी का फोन सही से खँगाल लो तो ये पता चल जाएगा कि वो किस हद तक बेरोजगार है और उसका टाइम का निवेश कहाँ डूब रहा है। इसके साथ-साथ आजकल लोग एक बंद दुनिया से बाहर आकर खुद की जिंदगी में जरूरत के अनुसार परिवर्तन ला रहे हैं पर अभी भी संकीर्ण परंपरओं और संस्कारों के अज्ञाणता में कैद बहुत सारे लोग अपने लाइफ-स्टाइल में धार्मिक कर्मकांड मिलाकर इसे और भी कठिन बना देते हैं। जबकि सब को यह पता है कि न सिर मुंडवाने से, न तिलक लगाने से, न पूजा-पाठ का ड्रामा करने से, न किसी नदी मे डुबकी लगाने से और न ही किसी देवी-देवता का नाम हजारों बार रटने से कोई मनुष्य सफल होता है। पर ऐसा करने से वो एक बृहत धार्मिक और राजनीतिक प्रणाली के अधीन जरूर हो जाता है। ये चीज़ों की संरचना बॉलीवुड छापा फैक्ट्री के समान है जिसे हम सब पसंद करते है क्योंकि ये हमें कहीं न कहीं हमारी विविध सभ्यता की पहचान से अवगत कराता है!

धर्म से आसान कोई धंधा नही है जो कम समय में ही ज्यादा फायदे के लालच में पढ़े-लिखों को भी अंधा बना कर रख देता है। हमें धर्म के नाम पर अंधविश्वास और रहस्यवाद विचारों में समय बर्बाद करने से अच्छा यथार्थवादी सोच अपनाना चाहिए। यथार्थ से दूर भागना खुद को धोखे में रखने के बराबर है। आज अपने अज्ञानता और साधन के अभाव में यदि कष्ट झेल रहे हैं तो आप कोई पूर्व-जन्म के पापी नही हैं क्योंकि पूर्व-जन्म बस एक दार्शनिक व्याख्या मात्र है जिसका कोई वैज्ञानिक प्रमाण नही है।

सुदेश कुमार