जाति, धर्म और हिन्दू राजनीति के समीकरण


आधुनिक युग में सफलता-पूर्वक जीवन व्यतीत करने के किये आपके पास टाइम और पैसे दोनो एक साथ होने चाहिए, जो कि लगभग 90% जनसंख्या के पास नहीं है। इन दोनों की कमी के कारण आप वही देखते हैं जो कि आपको दिखाया जाता है, उसके बाद इन परिस्थितियों में असहाय होकर खुद को सही साबित करने की लाचारी को ही अंधभक्ति कहते हैं।

जनता को बेवकूफ बनाने के लिए सब कुछ सही है। 80% हिन्दू आबादी वाले देश मे जितना अपने अस्तित्व के मिटने का खतरा अंधभक्त हिन्दुओं को पिछले पांच वर्षों से महसूस कराया जा रहा है शायद इतना तो महाभारत के टाइम में भी नही हुआ होगा। ....जिओ दिया, सब कुछ ऑनलाइन किया फिर भी भाजपा मंदिर नहीं बनाने के लिए बदनाम है।


राजनीति से अच्छा बिज़नेस अंधभक्तों से भरे भारत में कोई दूसरा हो ही नहीं सकता है। जहां जितना ज्यादा पिछड़ापन, वहां उतना ज्यादा फायदा। स्वविकास की प्रतिस्पर्धा में राजनीति करने वाले को याद रखना चाहये कि वोट बैंक की राजनीति किसी के घर की जमींदारी नहीं है।

धर्म औऱ संस्कृति के ठेकेदारी करने वाले अपने ब्रेनवास जोकर्स को जब भगवान बना कर बेचने पर तुले हैं तो राजनीतिक धुर्वीकरण में न्यूटन का तीसरा सिद्धांत तो आएगा ही। आज जब समान विचारधारा से जन्मी हज़ारों करोड़ की पतंजलि तक अंधभक्तों के साथ नही है तो बाकी की बात करना इनके अस्तित्व विलोपन का राग है।

अपने पास जो होता है, हम उसी का उपयोग राजनीति में भी करते है, अमेरिकी राजनीति आज केवल तकनीकी घोटाले की शिकार है, क्योंकि उनके पास समयानुरूप मुददे हैं। जहां की भारत अभी भी जाति, धर्म, प्राचीन संस्कृति और पिछड़ापन के राजनीतिक परिदशा को झेल रहा है। कांग्रेस कब तक इसका फायदा उठाती रहेगी और इनके नाम पर भाजपा कब तक अंधभक्तों के सहारे जनता को उल्लू बनाते रहेंगे? यह एक विचारणीय तथ्य है।

सुदेश कुमार

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