अपने आप से ईमानदार होने का क्या मतलब है?

ईमानदारी का असली स्वरूप खुद के साथ ईमानदार होना है। यह एक हर पल का अभ्यास है। अभ्यास इस बारे में सचेत होना है कि आप क्या कर रहे हैं और खुद से पूछना कि आप ऐसा क्यों कर रहे हैं।

हम में से अधिकांश लोगों को कम उम्र से ही अपने आर्थिक-स्तर को बेहतर बनाने के लिए अपनी भावनाओं को दबाना सिखाया जाता है। इसके कारण हमारे मन में खुद के प्रति एक गहरा अविश्वास पैदा होता है। जब आप दूसरों के बनाए नियमों से नहीं बच पाते हैं तो आपकी जिंदगी एक कठपुतली समान बन कर रह जाती है। आप किसी बाहरी प्रोग्रामिंग द्वारा निर्देशित हो कर अपना प्राकृतिक स्वरूप खो देते हैं।

आज की दुनिया का सबसे बड़ा सच है कि भ्रम, झूठ, हिंसा और डिप्रेशन का बहुत बड़े स्तर पर व्यापार हो रहा है। शिक्षित होने के बावजूद भी हमलोग अपने आंतरिक सत्य और करुणा से विच्छिन्न हो चुके हैं। इस करुणा को वापस जाग्रत करने के लिए वीगन और मानवतावादी विचारों के विश्वव्यापी आंदोलन की जरूरत पड़ रही है। तथ्य यह है कि ज्यादातर लोग वास्तव में अब खुद पर भरोसा नहीं करते हैं और अपनी जिम्मेदारी को दूसरे पर थोप देते हैं। स्वछन्द रूप से सोचने और महसूस करने के लिए भी हमें एक तथाकथित विशेषज्ञ की जरूरत पड़ती है। ये एक मुख्य कारण है कि सभी प्रकार के बिज़नेस में मार्केटिंग और विज्ञापन पर निवेश दिन प्रति दिन बढ़ता जा रहा है!

2020 की इस महान डिजिटल क्रांति के साथ हमें अब उस दुनिया की कल्पना करनी चाहिए जहां हम अब सिस्टम द्वारा नियंत्रित नहीं होंगे। कोई आर्थिक असुरक्षा का डर हमारे अंदर नही होगा। जहां हम सभी एक जागृत अवस्था में जीवन व्यतीत कर पाएंगे।  यह महसूस करने के लिए स्वतंत्र होंगे कि हम कौन हैं और आत्माभिव्यक्ति के लिए हर बार हमें अपने दिमाग का सहारा नही लेना पड़ेगा।

इसे कैसे संभव किया जा सकता है?

आप अपने व्यवहार, इरादों और इच्छाओं का अवतार है। खुद के प्रति ईमानदार होने का सही मतलब है खुद को स्पष्ट रूप से देखना, एक सटीक आत्म-धारणा के साथ सामने आना वास्तव में चुनौतीपूर्ण पर सच्चाई का रूप है। इसके लिए 

आपको यह जानना होगा कि जब आप किसी से नहीं मिलते, तो आप कैसा व्यवहार करते हैं - विशेषकर यहाँ अपने आप को आंकने की कोशिश न करें, पसंद और परिवर्तन बाद में भी आ सकते हैं, अभी के लिए केवल दयालु और गैर-निर्णयवादी बनें। 

डिजिटलीकरण के दौर में 'रैट-रेसिंग' रूटीन से निकल कर प्रकृति के साथ ज्यादा से ज्यादा समय बिताएं। अपने नजदीक जानवरों और पक्षियों को सुनने, जानने और पेड़ों, रंगों, आकृतियों, बनावट, पत्तियों आदि को देखने के लिए समय निकालें।

मन से बोलने पर ज्यादा से ज्यादा ध्यान दें। यह आपके अंदर एक ऊर्जा आवृत्ति का संचार करता है जो आपके भीतर प्रतिध्वनित होगा और आपको इमोशनल महसूस कराएगा। शायद इससे आपकी आंखों में आंसू भी आए या आपके होंठों पर मुस्कान आ जाए। दूसरी ओर अगर कोई व्यक्ति अपने एजेंडे के लिए डिज़ाइन किए गए, बनावटी व्यक्तित्व के साथ पूर्वनिर्मित विचारों से बोलता है, तो इसमें बहुत कम ऊर्जा होती है और आमतौर पर यह आपको असंतुष्ट, निराश, क्रोधित, भ्रमित और शक्तिहीन महसूस कराएगा। हिन्दू मायथोलॉजी में इसका अर्थ नमस्ते शब्द से जुड़ा है। जब आप दूसरे के बारे में अच्छा सोचकर कुछ मन से बोलते हैं तो आप इसे महसूस करते हैं। यही कारण है कि खुद के साथ रहने और अपने शरीर में फिर से महसूस करने की शक्ति और दूसरों से अपनी खुद की भावनाओं को समझने की क्षमता बनाने के लिए समय निकालना इतना महत्वपूर्ण है।

वीगन सुदेश

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