पूजा-पाठ के नाम पर जबरन चंदा वसूली का धंधा क्यों बंद होना चाहिए?


विज्ञान मानता है कि धरती पर इंसान की तरह का प्राणी लगभग 20 लाख साल से है। जबकि मानव सभ्यता तकरीबन 20 हज़ार साल पुरानी है। आदिम मानव का पाषाण युग तक कोई भगवान नही था। प्रकृति के नियम के अनुसार जानवरों के जैसे सबको अपना भोजन खुद जुटाना पड़ता था। 

बढ़ते समय के साथ-साथ मानव और भी व्यवस्थित होता गया। जैसा कि हम सब जानते हैं पृथ्वी पर मानव ही ऐसा जीव है जो अपनी बुद्धि का उपयोग कर अपनी प्राकृतिक जरूरतों जैसे भोजन, सेक्स और प्रजनन के बहुत आगे तक सोच सकता है। जिसका उपयोग करके मानव ने पहले संघटन की ताकत को जाना और समझा। इसके बाद लोग समूहों, गिरोहों तथा कबीलों में बंटने लगे जिससे सामूहिक हिंसा शुरु हुई एवं वर्चस्व की लड़ाई ने राजनीति की उत्पत्ति की।

दुनिया में किसी भी धर्म को खंगाल लीजिये उनमें मूल बातें लगभग एक जैसी ही हैं। अंधभक्त, डरपोक, कामी, क्रोधी, लालची, खुदगर्ज, कमज़ोर, कामचोर और ठग प्रवृत्ति जैसे नकारात्मक गुणों वाले लोगों के माध्यम से शासन करने के लिए उनके समझदार लोगों ने राजनीतिक जड़े मजबूत करने के क्रम में धर्म को बढ़ावा दिया।


आगे चलकर सभी धर्मों ने ईश्वरीय दूत या देवी-देवताओं की उत्पति की परिकल्पना को धर्म ग्रंथों के द्वारा फैलाया। सीधे-साधे लोगों को अप्रत्यक्ष रूप से उनके जीवन-यापन के व्यवस्था में मदद कर एवम एक काल्पनिक स्वर्ग के बारे में बार-बार झूठ बोल कर ईश्वरीय शक्ति के नाम पर बेवकूफ़ बनाया। जनता के पैसों को भगवान के नाम पर जमाकर अंधविश्वास का व्यापार इतना फ़ैलाया ताकि समाज में धर्म के ठेकेदार बिना मेहनत के सभी सुख-सुविधाओं के साथ सम्मान के अधिकारी बने रहें। जो धर्म जितना ज्यादा पुराना है वो उतना ही इस धंधे में पारंगत है। आज के इन्टरनेट-स्पेस टेक्नोलॉजी की दुनिया मे भी इनके अनुसार पृथ्वी पर होने वाली प्रकृति की हर घटना जैसे कि भूकंप, आंधी-तूफान, बाढ़ और बीमारी सर्व शक्तिमान ईश्वर की इच्छाओं से होती है। 

आजकल जिस देश में आर्थिक विकास का स्तर जितनी ज्यादा बढ़ रही है वहां धर्म और धार्मिक कर्म-कांड को मानने वाले लोगों की जनसंख्या उतनी ही तेजी से घट रही है। पर पिछले कुछ दशकों से विकासशील देशों में संघटन शक्ति को बरकरार रखने के लिए चंदा वसूली का व्यापार तेजी से चल रहा है। इसलिए किसी  भी छोटे या बड़े पर्व-त्योहार में कार्यकर्ता या वालंटियर्स अपने इलाके में रहने वाले लोगों से चंदा मांगने जाते है तो वे चंदा देने वाले के आर्थिक स्थिति पर अपने जजमेंट के अनुसार चंदे की धन राशि देने की मांग करते है। कोई विरोध करता है तो ये कहते हैं कि हमारे समाज ने यह तय किया है कि कम से कम इतना चंदा देना तो जरूरी है। अपनी बात मनवाने के लिए ये गाली-गलौज से लेकर मार-पीट तक भी करने से नही चूकते।  

सरकारी टैक्स से शायद आप बच जाएँ पर चंदे से नही बच सकते। आपके पास भले ही इलाज़ के पैसे हो या नही पर सम्मान के साथ अपने समाज में रहने के लिए चंदे के लिए पैसे जरुर होना चाहिए। सभी धर्मो में संगठन मंत्रियों ने इस कार्य में राजनीतिक संरक्षण का पूरा फायदा उठाया है। चंदे के राशि का 20-70 प्रतिशत तक कार्यकर्तओं को संगठित करने में खर्च होता है जो कि अप्रत्यक्ष रुप से किसी राजनीतिक विचारधारा को आगे बढ़ाने का काम करते है। चंदे के पैसे का ना कोई ऑफिसियल ऑडिट होता है ना ही यहां कोई टैक्स का टेंशन। गली-चौराहे में इसके लिए बड़े-बड़े पोस्टर लगाने का नियम-कानून सरकार नही बल्कि राजनीतिक पार्टियां खुद ही बना लेती है।

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