कितना जरूरी है मूर्ति पूजा करना ?


भारत मे मूर्ति पूजा का प्रचलन वैदिक काल (1500-500 BCE) से चला आ रहा है। आज के समय में मूर्ति पूजा हिन्दू संस्कृति की सबसे बड़ी पहचान मानी जाती है  जिसका सबसे ज्यादा विस्तार बुद्ध काल (483-400 BCE) में हुआ था। इसके साथ धार्मिक कर्म-कांड जैसे मूर्ति साधना एवम भजन-पूजा-आरती इत्यादि भी आये। बहुत सारे लोग अपने धार्मिक अज्ञानता के कारण मूर्ति पूजा को ही ईश्वर की आराधना समझते हैं जो कि सही नही है। मूर्ति हम अपने देवी या देवता की बनाते है जो कि ईश्वर तक पहुँचने का एक रास्ता मात्र है।


हिन्दूओं में आस्था और जाने-अनजाने में किये पापों की स्वीकारोक्ति इत्यादि मूर्ति पूजा के साथ-साथ औऱ भी बहुत सारे कर्म-कांडों से जुड़ा है। जिसमें व्यक्ति पंचांग में दिए ग्रहों के समयानुसार अपने मेहनत के पैसे से मिट्टी और सजावटी सामान खरीदकर किसी देव या देवी की मूर्ति बनाता (या खरीदता) है। फिर कई दिनों तक सात्त्विक दिनचर्या में अपनी कामनाओं को पूरा करने के लिए उसकी पूजा करता है और साथ में अपने गुनाहों के लिए खुद ही उससे माफी मांगता है। इसके बाद इसका किसी जल-स्थल में विसर्जन कर देता है। 

वैज्ञनिक रूप से जब हम पूरी श्रद्धा और विस्वास के साथ किसी मूर्ति की पूजा करते है तो उससे एक जुड़ाव महसूस होता और अपनी कामनाओं को पूरा कराने में मूर्ति एक साधन बन जाती है। निरंतर प्रयास से कामनायें पूर्ण भी होती है हालांकि ये चमत्कार मूर्ति से नही बल्कि मूर्ति पूजा के माध्यम से हुए मन की एकाग्रता के कारण होती है।

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