कैल्शियम कार्बाइड एक बहुत ज़हरीला केमिकल है।

 

कैल्शियम कार्बाइड एक बहुत ज़हरीला केमिकल है जिसे कभी भी खाने में या उसके आस-पास इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। मुख्य रूप से इंडस्ट्रियल वेल्डिंग और एसिटिलीन-गैस बनाने में इस्तेमाल होने वाला यह कंपाउंड, आम और केले जैसे फलों को आर्टिफिशियल तरीके से पकाने के लिए भी गैर-कानूनी तरीके से इस्तेमाल किया जाता है जबकि भारत में फ़ूड सेफ़्टी एंड स्टैंडर्ड्स (प्रोहिबिशन एंड रिस्ट्रिक्शन्स ऑन सेल्स) रेगुलेशन्स, 2011 के तहत इस तरह के इस्तेमाल पर पूरी तरह बैन है।


📌 *आप क्या कर सकते हैं* -


हमेशा नैचुरली पके फल चुनें, अजीब गंध या बहुत ज़्यादा नरम टेक्सचर की जांच करें, और उन ट्रेडर्स को सपोर्ट करें जो कार्बाइड के बजाय एथिलीन-बेस्ड, FSSAI-अप्रूव्ड पकाने के तरीकों का इस्तेमाल करते हैं। लोगों में जागरूकता इस ज़हरीले तरीके को हमारे फ़ूड सिस्टम से हमेशा के लिए बाहर निकालने के लिए ज़रूरी है।


📌 *कैल्शियम कार्बाइड खतरनाक क्यों है?*


कमर्शियल कैल्शियम कार्बाइड में अक्सर आर्सेनिक और फ़ॉस्फ़ोरस के खतरनाक निशान होते हैं। जब कैल्शियम कार्बाइड नमी के संपर्क में आता है तो यह एसिटिलीन गैस छोड़ता है—यह एक ऐसी चीज़ है जो शरीर में नॉर्मल ऑक्सीजन डिलीवरी में रुकावट डालती है और हाइपोक्सिया पैदा कर सकती है।


📌 *हेल्थ पर असर* -


कार्बाइड से ट्रीटेड फल या धुएं को खाने या सांस में लेने से सीने और पेट में जलन, गले में जलन, तेज़ उल्टी, गंभीर डायरिया और सांस लेने में तकलीफ जैसे गंभीर लक्षण हो सकते हैं। पाउडर के संपर्क में आने वाले वर्कर को खांसी, नाक में जलन, प्यास, चक्कर आना और आम कमजोरी भी हो सकती है।


☘️ वीगन सुदेश

🩷 vegansudesh.com


मनुर्भव

 

ऋग्वेद, अथर्ववेद और उपनिषदों में यह कहा गया है कि मनुष्य कहलाना मानव शरीर में जन्म पाने तक सीमित नहीं है। मनुष्य वह है जो अपने मन को धर्म और करुणा की राह पर अनुशासित करता है — “मनो‘नुयाति इति मनुष्यः।” यही कारण है कि वेदों में स्पष्ट रूप से लिखी गई है — “मनुर्भव” (ऋग्वेद 10.53.6) — अर्थात “सच्चा मनुष्य बनो।”


👨‍🏫 वीगन सुदेश

🏡 स्पाइस ऑफ लाइफ

☘️ hindi.vegansudesh.com


आज के समय में इस वैदिक वाक्य का एक बड़ा व्यावहारिक अर्थ हमारे लाइफस्टाइल से भी जुड़ता है। जब हम केवल अपने स्वाद और आदत के लिए जानवरों को कष्ट पहुँचाते हैं तो हमारे मन में करुणा का स्तर शून्य हो जाता है। पर यदि हम अहिंसा चुनते हैं तब हम उस “सच्चे मनुष्य” की परिभाषा के करीब पहुँचते हैं जिसका वेदों में आदर्श रखा गया है।


🐭 facebook.com/iwriteaboutyou

जैसा अन्न, वैसा मन।

 

शास्त्रों में स्पष्ट कहा गया है —

"यथान्नं तथा मनः"

अर्थात् जैसा अन्न, वैसा मन।


यह नियम केवल मनुष्य पर ही नहीं बल्कि जीव-जंतुओं पर भी लागू होता है। यदि गौमाता को प्राकृतिक आहार जैसे घास, चारा, अनाज दिया जाए तो उसका दूध सात्त्विक और शुद्ध माना जाता है। परन्तु जब गाय को हड्डी या मांस से बने चारे खिलाए जाते हैं तो उसकी सात्त्विकता नष्ट हो जाती है।


हिंदू धर्म की दृष्टि से दूध तभी पवित्र कहा जा सकता है जब वह हिंसा-रहित, शुद्ध और सात्त्विक आहार पर आधारित हो। किन्तु वीगन विचारधारा इससे भी एक कदम आगे जाकर यह कहती है कि — किसी भी पशु के दूध, दही और इससे बनी चीज़ों का उपयोग करना उचित नहीं है क्योंकि यह भी पशु-शोषण का रूप है।


इसलिए प्रश्न हमारे सामने खड़ा होता है —


👉 क्या हम आज भी पुरानी सोच से जुड़ें रहें या ऐसी जीवनशैली अपनाएँ जिसमें हर जीव के प्रति दया और करुणा हो?


🌱 अहिंसा का मार्ग हमें सिखाता है कि असली सात्त्विकता तब ही है जब हमारी थाली भी करुणा से भरी हो।


🪀 सुदेश कुमार 

खालिस्तानियों ने सिख धर्म को कैसे विकृत किया?




बचपन की एक झलक को याद करना हमेशा सुखद अनुभव होता है। जब मैं अपने प्राथमिक विद्यालय की तीसरी कक्षा में था, तब मैंने गुरु नानक देवजी पेंटिंग प्रतियोगिता जीती थी। मुझे स्थानीय गुरुद्वारा (एक सिख मंदिर) द्वारा 1988 में पुरस्कृत किया गया था। यह छात्रों के लिए सिख धर्म के संस्थापक गुरु नानक देवजी की यात्रा और योगदान के बारे में जानने के लिए एक प्रेरणा थी। उनकी शिक्षाएँ सिख धर्म के पवित्र ग्रंथ गुरु ग्रंथ साहिब में निहित हैं, जिसमें उनके लिए 974 गुरबाणी शामिल हैं। आज भी मैं उनके सामाजिक न्याय और समाज के लिए निस्वार्थ योगदान को फॉलो करता हूँ।


यह भारतीय इतिहास का एक काला क्षण था जब 31 अक्टूबर 1984 को प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सिख समुदाय से जुड़े दो सिक्युरिटी कमांडो द्वारा हत्या कर दी गई थी। जैसा कि हम जानते हैं, सिख समुदाय अपनी विशिष्ट संस्कृति और सिख धर्म को बढ़ावा देने के धर्मार्थ कार्यों के लिए जाना जाता है। लेकिन 1984 के बाद, सिख समुदाय को पॉलिटिकल ग्रुप द्वारा बदनाम किया गया और उनके धार्मिक दृष्टिकोण, विशिष्ट पोशाक, विशेष रूप से पगड़ी और लंबे बालों के कारण उनसे भेदभाव किया जाता रहा है।  लेकिन आजकल विदेशों में खालिस्तान समर्थक अलगाववादियों के आंदोलन के बाद सिख समुदाय के लिए हालात बदतर होते जा रहे हैं। उन्हें खालिस्तानी माना जा रहा है।


खालिस्तान आंदोलन एक स्वतंत्र देश की मांग करता है जो एक विवादास्पद मुद्दा रहा है क्योंकि यह भारत की अखंडता को चुनौती देता है। 1980 के दशक में खालिस्तान आंदोलन अपने चरम पर था, जिसके कारण भारत के पंजाब राज्य में कई हिंसक हमले हुए थे और हज़ारों लोग मारे गए। 1984 में, भारतीय सेना ने खालिस्तानी अलगाववादियों को हटाने के लिए 'ब्लू स्टार' नामक एक ऑपरेशन के ज़रिए गोल्डन टेंपल पर रेड किया। इस ऑपरेशन के परिणामस्वरूप कई लोगों की मौत हुई और गोल्डन टेंपल को काफ़ी नुकसान हुआ। ऑपरेशन ब्लू स्टार के बाद प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की उनके दो सिक्युरिटी कमांडो ने हत्या कर दी, जो सिख थे जिसके कारण देश भर में सिख विरोधी दंगे भड़क उठे और हज़ारों सिख मारे गए।


अब भारत में खालिस्तानी आंदोलन की गति धीमी हो गई है लेकिन विदेशों में सिख समुदाय के कुछ लोग खालिस्तान बनाने के लिए प्रदर्शन कर रहे हैं और भारत विरोधी गतिविधियों में शामिल हैं, जो पिछले कुछ सालों में और भी तेज़ हो गई हैं। इस बात की पूरी संभावना है कि भारत सरकार उन सभी सिख बिज़नेस ग्रुप और उनके संगठनों पर कड़ी निगरानी रख रही है जो खालिस्तानियों को फंड कर रहे हैं। इसके अलावा सिख यात्रियों को भारत आने पर प्रतिबंध लगाया जा सकता है, भले ही वे भारतीय मूल के हों। ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, UK और USA में रहने वाले सिखों को भारत में प्रवेश करने पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगाया जा सकता है। हालाँकि खालिस्तानी वास्तव में सिख समुदाय का प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं, लेकिन हर सिख उनके गलत कामों, खासकर विदेशों में भारत विरोधी गतिविधियों का शिकार है।


खालिस्तान आंदोलन ने एक अलगाववादी एजेंडे को बढ़ावा देकर सिख धर्म को विकृत कर दिया है जो सिख धर्म की मूल शिक्षाओं से अलग है। इस विकृति से सिख धर्म को वैश्विक स्तर पर गलत तरीके से समझे जाने का जोखिम है क्योंकि भारत विरोधी गतिविधियों इसके मूलभूत सिद्धांतों के खिलाफ हैं।


- प्रो. सुदेश कुमार


ऑस्ट्रेलियाई विश्वविद्यालयों ने छह राज्यों पंजाब, हरियाणा, गुजरात, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश और जम्मू-कश्मीर के भारतीय छात्रों पर प्रतिबंध लगा दिया है।


ऑस्ट्रेलियाई विश्वविद्यालयों का आरोप है कि इन राज्यों से ज्यादातर लोग काम करने और किसी भी तरह से वहाँ बसने के लिए जाते हैं! शुक्र है कि राजधानी होने के कारण दिल्ली प्रतिबंध से बची हुई है। उन्हें क्लास रूम आधारित किताबी शिक्षा में बिल्कुल भी रुचि नहीं है। आख़िरकार यह सही मायनों में कोई किताबी शिक्षा नहीं बल्कि व्यवसाय का एक तरीका है। और ये सारी बातें काफी हद तक सच भी हैं। लोग संपन्न देशों में बसने के लिए ऐसी शिक्षा खरीदते हैं लेकिन यह दूसरे रूपों में मध्यम वर्ग की गरीबी का चेहरा है.. ऑस्ट्रेलिया को इस पर राजनीति नहीं करनी चाहिए। उन्हें NRI प्रोफेसरों सहित पूरे भारत पर प्रतिबंध लगाना चाहिए और देखना चाहिए कि उनके विश्वविद्यालय भारतीय धन और सस्ते में उपलब्ध NRI (भारतीय) प्रोफेसरों के बिना कैसे चल सकते हैं।

प्रो. सुदेश कुमार



Australian universities allege that most students from these states move to work and get settled there by hook or by crook! Thankfully Delhi being the capital has been spared from the ban. They are not at all interested in class room based academic education. After all it is not a academic education in true sense but a way of trade. And all these things are true to a large extent. People buy such education to settle in rich countries but this is the face of middle class poverty in other forms. Australia should not do politics on this.  They should ban whole of India including NRI professors and see how their universities can sustain without Indian money and cheaply available NRI (Indian) professors.

Prof Sudesh Kumar


मेरा फूड कोड!


हम जो कुछ भी करते हैं उसके लिए सिर्फ भावनात्मक जुड़ाव ही काफी नहीं है। दुनिया में बहुत से लोग शाकाहारी हैं क्योंकि वे किसी परंपरा, आस्था और संस्कृति का पालन करते हैं। इसलिए अगर हर धर्म में सुझाए गए भोजन विकल्पों को समय के साथ अपडेट किया जाए तो यह सभी के लिए एक बड़ा बदलाव होगा। आप कल्पना कर सकते हैं ऐसा करने से हमारे समाज में जजमेंटल रवैया बहुत हद तक कम हो जाएगा।

धार्मिक स्वतंत्रता के बहाने प्रतिगामी अनुष्ठानों को रोका जाना चाहिए। किसी जानवर का गला काटना या अप्रत्यक्ष रूप से उसका समर्थन करना या हत्या न रोक पाने के लिए अपने खान-पान या धर्म का बहाना देना किसी व्यक्ति को कसाई की दुकान से जानवर का मांस खरीदने वाले पड़ोसी से भी अधिक क्रूर बना देता है। इस क्रूरता के परिणाम आस-पास रहनें वाले मनुष्यों पर कई अन्य तरीकों से प्रभाव डालते हैं।

अधिकांश युवा इंटरनेट का उपयोग कर रहे हैं और उनमें से कुछ ने व्यक्तिगत रूप से वीगन बनना चुना है उनकी स्वशिक्षा ने उन्हें ऐसा बना दिया और उन्होंने पारंपरिक भोजन विकल्पों से खुद को दूर कर लिया। तो आपको आश्चर्य हो सकता है कि क्या हम भी अपनी परंपराओं और धार्मिक प्रथाओं को बदलने के लिए समान प्रयास कर सकते हैं जिन्हें समय के साथ अपडेट किया जाना चाहिए। लेकिन आपके मन में सवाल आता है कि अगर आप पशु क्रूरता को रोकने (या किसी भी प्रतिगामी प्रथा को बंद करने) के लिए अपने धर्म के खिलाफ बोलेंगे तो आप मुसीबत में पड़ जाएंगे। नहीं, जानवरों की रक्षा के लिए आवाज उठाने से आपको परेशानी नहीं होगी। आप ऐसा करने वाले सिर्फ एक व्यक्ति नहीं हैं। आप पशु क्रूरता के खिलाफ वैश्विक आंदोलन का हिस्सा हैं, जिसे आमतौर पर वीगनइज़्म कहा जाता है। इसके लिए कोई बहाना या आपके अंदर कोई डर नहीं होना चाहिए। यदि आप प्रगतिशील बन कर समाज मे कुछ बदलना चाहते हैं तो निडर होकर आगे बढ़ें।

 नोट: यह लेख पहली बार बीटी - एक इंग्लिश न्यूज़ पेपर - अगस्त 2023 में प्रकाशित हुआ है।

 प्रो. सुदेश कुमार

 - संस्थापक,

 पशु बलि रोकने के लिए वैश्विक अभियान

प्रजातिवाद को ना कैसे कहें? ❌


यह लेख veganmumbai.com के संस्थापक प्रो. सुदेश कुमार द्वारा लिखा गया है। 

हमारे पालतू जानवर ऑक्सीटोसिन निर्मित प्यार के कारण हमारे दिल में अपना खास स्थान रखते हैं। हर दिन हम उनकी मासूमियत को निहारते हैं और वे भी हमें अपना समझते हैं। धीरे-धीरे हम एक दूसरे के साथ एक भावनात्मक रिश्ते में बंध जाते हैं और हमलोग उनकी ज्यादा परवाह करने लगते हैं। यह बंधन पालतू जानवरों के साथ हमारे मानव निर्मित वातावरण में अपने सह-अस्तित्व का प्रतीक है।

हमने अपने पालतू जानवरों को एक व्यक्ति की तरह नाम दिए हैं। इसलिए स्वभाविक रूप से प्रत्येक पालतू जानवर का एक व्यक्तिगत नाम होता है। और जैसा कि हमारे पालतू जानवर परिवार के सदस्य हैं इसलिए वे भोजन से लेकर बाहर घूमने-फिरने जैसी हर जरूरी चीजों के लिए पूरी तरह से हम पर निर्भर होते हैं। स्पष्ट रूप से यह एक अपराधिक मामला माना जाएगा यदि कोई मनुष्य उन्हें मारने का प्रयास करे या तो उन्हें मारने की अनुमति दे।

यदि हम एनिमल फूड इंडस्ट्री की बात करें तो दिन-प्रतिदिन इसकी मांगे बढ़ती जा रही है। ये मूलतः मानव प्रवृत्तियों के अनुसार चलते हैं जिसके कारण ज्यादातर मांस आधारित फूड प्रोडक्ट पालतू जानवरों के लिए मार्केट में उपलब्ध हैं।

एक पशु-प्रेमी होने के नाते हम पालतू जानवरों के भोजन और देखभाल के खर्चों पर खर्च की गई हमारी मेहनत की कमाई - अर्थशास्त्र की भाषा में कहें तो एक मांग में बदल जाती है जो pet एनिमल इंडस्ट्री की स्थिरता को सुनिश्चित करता है। इसके साथ यह एनिमल फूड सोर्सिंग आदि की पारदर्शिता को भी सुनिश्चित करता है। बात यहाँ आती है कि हम आपको ये क्यों बता रहें है? 

इसका उद्देश्य यह है कि मेरे सहित ढेर सारे और भी एनिमल राइट एक्टिविस्ट हैं जो प्रजातिवाद को रोकने के लिए प्रयास कर रहे हैं उसमें पहला कदम यह है कि आमलोगों को अप्रत्यक्ष रूप से पशु हत्या की फंडिग को रोकने के लिए शिक्षित करना है।

क्या आपने कभी सोचा है कि एनिमल फूड इंडस्ट्री के लिए कितने जानवरों को मार दिया जाता है? आमतौर पर वे मारे गए जानवर भी एक ही जनजाति के सदस्य होते हैं।

यहाँ सबसे बड़ी विचार करने वाली बात यह है कि खुद को पशु प्रेमी कहने वाले लोग परोक्ष रूप से - एक को खिलाने और दूसरे को मारने के लिए पैसे देने को उचित नहीं ठहरा सकते। 

इसलिए हम सभी के लिए वीगन एनिमल फूड प्रोडक्ट का उपयोग करना और दूसरों को भी इसके बारे में बताना एक आवश्यक पहल होगी। वीगनिजम के बारे में अधिक जानकारी के लिए कृपया इंटरनेट पर वीगन वीडियो देखें और veganmumbai.com पर विजिट करें! 


ब्रह्ममुहूर्त को महत्वपूर्ण क्यों माना जाता है?


किसे कहते हैं 'ब्रह्ममुहूर्त?

ब्रह्म का मतलब परम तत्व या परमात्मा। मुहूर्त यानी अनुकूल समय। 24 घंटे में 30 मुहूर्त होते हैं। 30 मुहूर्त में 8 प्रहर होते हैं। ब्रह्ममुहूर्त रा‍त्रि का चौथा प्रहर होता है। चौथा प्रहर उषा नाम से है।

 

आठ प्रहर के नाम.....

दिन के चार .....

1.  पूर्वान्ह,

2.  मध्यान्ह,

3.  अपरान्ह

4.  सायंकाल।

रात्रि के चार.....

1. प्रदोष

2. निशिथ

3. त्रियामा

4. उषा।

सूर्योदय के पूर्व के प्रहर में दो मुहूर्त होते हैं। उनमें से पहले मुहूर्त को ब्रह्ममुहूर्त कहते हैं। दिन-रात का 30वां भाग मुहूर्त कहलाता है अर्थात 48 मिनट का कालखंड मुहूर्त कहलाता है। हमारी घड़ी के अनुसार प्रात: 4.24 am - 5.12 am का समय ब्रह्ममुहूर्त है।

 

ब्रह्ममुहूर्त में क्या करें.....

ब्रह्ममुहूर्त में 4 कार्यों में से कोई एक कार्य करें:

1. ध्यान

2. प्रार्थना

3. अध्ययन

4. वंदन

 

ब्रह्ममुहूर्त में क्या न करें....

नकारात्मक विचार, बहस, वार्तालाप, संभोग, नींद, भोजन, यात्रा, किसी भी प्रकार का शोर आदि।

 

ब्रह्ममुहूर्त में उठने का वैज्ञानिक महत्व....

इसी समय वायुमंडल में ऑक्सीजन (प्राणवायु) की मात्रा सबसे अधिक होती है, जो फेफड़ों की शुद्धि के लिए महत्वपूर्ण होती है। शुद्ध वायु मिलने से मन, मस्तिष्क भी स्वस्थ रहता है। इस समय बहने वाली वायु को अमृततुल्य कहा गया है। ब्रह्म मुहूर्त में उठकर टहलने से शरीर में संजीवनी शक्ति का संचार होता है। यह समय अध्ययन के लिए भी सर्वोत्तम बताया गया है, क्योंकि रात को आराम करने के बाद सुबह जब हम उठते हैं तो शरीर तथा मस्तिष्क में भी स्फूर्ति व ताजगी बनी रहती है।

सुबह ऑक्सिजन का लेवल ज्यादा होता है तो मस्तिष्क को अतिरिक्त ऊर्जा प्रदान करता है जिसके चलते अध्ययन बातें स्मृति कोष में आसानी से चली जाती है।

 

वीगन सुदेश 

लॉकडाउन इंडिया की एक झलक!

 - वीगन सुदेश

 भारत ने मार्च 2020 के बीच महामारी की स्थिति को नियंत्रित करने के लिए एक पूर्ण लॉकडाउन शुरू कर दिया था, जो अभी भी काफी हद तक जारी है। लॉकडाउन के इस लंबे दौर ने पूरे देश में बेहद प्रतिबंधित माहौल बना दिया है, जिसे सही शब्दों में हम लॉकडाउन इंडिया कह सकते हैं। लॉकडाउन इंडिया में तर्कसंगत होने का मेरा पहला सुझाव यह है कि कृपया सरकार और भगवान के अस्तित्व पर सवाल उठाना बंद करें।कोरोना काल में डेढ़ साल से भी ज्यादा लम्बे लॉकडाउन के बाद सरकार के निकम्मेपन की बात यदि छोड़ दें तो शायद आप सोचते होंगे कि इकोनॉमी ने हमें डुबाया या तो हमलोगों ने इकोनॉमी को डूबा दिया। यहाँ मैं आपके साथ इस विषय पर अपने विचार शेयर कर रहा हूँ। ये मेरे यूट्यूब चैनल vegansudesh पर भी उपलब्ध है। 

भारत की विशाल अर्थव्यवस्था के बंद होने और 4G दुनिया में महामारी के दौरान लोगों के दर्द को कई गुना बढ़ाने वाली सरकार की अक्षमताओं को इतिहास में काले अक्षरों में लिखा जाएगा। भविष्य में इसके बारे में बात करना कितना भी कड़वा क्यों न लगे, लेकिन आजकल हम में से अधिकांश के लिए यही सच्चाई है। इसका कारण चाहे जो भी हो, हम में से अधिकांश लोगों को कम उम्र से ही अपने आर्थिक-स्तर को बेहतर बनाने के लिए अपनी भावनाओं को दबाना सिखाया जाता है। इसके कारण हमारे मन में खुद के प्रति एक गहरा अविश्वास पैदा होता है। लॉकडाउन में बने हालात   हमारा ध्यान इस बात पर खीचतें है कि जब आप दूसरों के बनाए नियमों से नहीं बच पाते हैं तो आपकी जिंदगी एक कठपुतली समान बन कर रह जाती है।

कोविड काल में एक बड़े स्तर पर सोशल लाइफ का डिजिटलाईजेशन हमलोगों को मानसिक रूप से आक्रामक बना रहा है। स्मार्टफोन पर वायरल होते कंटेंट्स लोगों की जिंदगी में दिशा और दशा तय कर रहें हैं। सालों से लॉकडाउन के कारण स्मार्टफोन में डूबी दुनिया मानसिक विकारों का शिकार बन रही है। इसके कारण बहुत सारे घरों में सुख-शांति समाप्त हो रही है और कुछ तो पथभ्रष्ट हो कर साइबर क्राइम की ओर अग्रसर हो रहे हैं, जो कि हमारे देश की विशाल आबादी के लिए जहर है।

सोशल मीडिया शायद आपको साइलेंट न नज़र आये पर यहां हर सेल्फी के पीछे हमेशा बहुत कुछ छिपा होता है। जैसे कि डर, मायूसी, बेरोज़गारी, अकेलापन, डिप्रेशन, लत, कर्ज का दर्द, परिवार में पसरे दुखों का दरिया, कम्पटीशन की दौड़ में रिजेक्शन इत्यादि। इसके बाद फिर किसी बीमारी के कारण एक अस्पताल के ICU में एडमिट होना, ये सब कुछ हमलोगों को एक करुणामयी जीवन के साथ पारस्परिक देखभाल और अंतर-निर्भरता की ओर ले जाते हैं। इस अंतर-निर्भरता के साथ किसी भी रिश्ते में एक व्यक्तित्व के साथ का जुड़ाव, हमारे जीवन को समृद्ध करता है। यह हमें दूसरों के जीवन को भी समृद्ध करने के लिए प्रोत्साहित करता है।

हमलोग स्वभाव से सामाजिक हैं और रिश्तों में अर्थ ग्रहण करते हैं। नौकरी, व्यवसाय अथवा करियर एक रबड़ की गुलेल जैसे हैं जिसके साथ रिस्क लेना आपको आर्थिक रूप से जीत या हार की ओर ले जाता है। लेकिन रिलेशनशिप, परिवार, स्वास्थ्य, दोस्ती, अतंरआत्मा कांच के बने होते हैं, जिसके टूटने से आवाजें सभी टुकड़ों से आती है।  

2020s की इस महान डिजिटल क्रांति के साथ हमें अब उस दुनिया की कल्पना करनी चाहिए जहाँ हम अब सिस्टम द्वारा नियंत्रित नहीं होंगे। कोई आर्थिक असुरक्षा का डर हमारे अंदर नहीं होगा। जहां हम सभी एक जागृत अवस्था में जीवन व्यतीत कर पायेंगे। यह महसूस करने के लिए स्वतंत्र होंगे कि हम कौन हैं और आत्माभिव्यक्ति के लिए हर बार हमें अपने दिमाग का सहारा नहीं लेना पड़ेगा।

- वीगन सुदेश

क्या कोई डर-निवारक वैक्सीन भी होता है?

किसको कोरोना हुआ, किसको नहीं हुआ?.. अब यह मसला नहीं रह गया! देर-सवेर सभी को इससे गुजरना है! पूरे भारत देश में मेडिकल व्यवस्था की दयनीय स्थिति के कारण वायरस के लोड से ज्यादा भय लोड हो चुका है! कोरोना ने पूरे देश में एक युद्ध की स्थिति पैदा कर दी है। कई परिवारों के ऊपर मुश्किलों का पहाड़ टूट पड़ा है जो लगातार लॉकडाउन के कारण दिन-प्रतिदिन और भी बढ़ता जा रहा है। मेरा अनुरोध है कि सभी एक दूसरे के संपर्क में बने रहें। बिना झिझक अपनी चीज़ें शेयर करें। डिजिटल दुनिया को अपनी जिंदगी में पूरी तरह से कदम रखने की अनुमति दें। यह अफरा-तफरी का वक्त भी गुजर जायेगा, दवा और ऑक्सीजन के अलावा, सच्ची सोच, साथ और हौसले की जरूरत है। यह याद रखें कि सकारात्मक विचारों से बड़ा कोई इम्यूनिटी बूस्टर नहीं है।

अफवाहों को सर ना चढ़ाएं! आपदा की बारिश में चारों ओर से आधे-अधूरे ज्ञान के मेंढक टर्राने लगते हैं। मुश्किल के समय में फ्री का ज्ञान बांटने से अच्छा है हम कुछ दर्द को बांटने या तो खत्म करने का प्रयास करें। सबसे पहले तो नेगेटिव और पैनिक चीज़ों को फैलाना बंद कर दें। किसी भी परिस्थिति में मनोबल कम न होने दें बल्कि दुसरों की हिम्मत बढाये, हर सम्भव मदद करें। हम सब एक विस्तृत परिवार हैं इसलिए एक दूसरे से बातचीत करते रहें। जो कुछ भी कर सकते हैं जरूर करें। अपने को खुशकिस्मत समझे की आप इस स्थिति में है जो दूसरों को एक नई जिंदगी देने में अपना कुछ तो योगदान दे पा रहें हैं।

ये डर कि 'कहीं मुझे कोरोना न हो जाए, कहीं इसे न हो जाए, कहीं उसे न हो जाए!'.. इन बातों से बाहर आ जाएं! क्योंकि डरपोक लोगों से युद्ध नहीं लड़ा जाता! जिंदगी की सबसे बड़ी लड़ाई, रोग से जंग होती है.. क्योंकि इसमें आपके धैर्य, निडरता और मानसिक ताकत का वास्तविक परीक्षण होता है! आपने जिंदगी भर अपने जीवन को किस तरह व्यतीत किया हैं, यही बात रोग होने पर भी काम आती है। अगर आप आजीवन.. दुखी, निराश, अविश्वासी, संकुचित, कामी, क्रोधी, लालची और सशंकित होकर जिए हैं.. तो यही मनोभाव, रोग हो जाने पर गद्दार की तरह, शत्रु सेना का साथ देकर आपकी ताकत कम कर देते हैं! किंतु अगर आप जीवन में खुशमिजाज, निडर और पॉजिटिव रहे हैं.. तो यही मनोभाव संकट के बादलों को चीर कर निकलने की ताकत देता है! यानी आपकी ताकत को कई गुना ज्यादा बढ़ा देता हैं !

कोरोना पॉजिटिव होना यदि हमारे भीतर के सभी नेगेटिव विचारों को जला दे तो यह वरदान ही है अभिशाप नहीं! सारी धन-दौलत, गुरुर, घमंड और दिखावा धरे के धरे रह जाते हैं.. सबसे ज्यादा जरूरी है आपका और आपके अपनों का जिंदा रहना! कोरोना ने बता दिया कि जिंदगी में, जीवन से अधिक कीमती कुछ भी नहीं! शरीर की हर सांस जीवन की डोर को बचाए रखना चाहती है! आप बेशक मन से टूट जाएं मगर ये याद रखें कि आपका शरीर मरना नहीं चाहता! चाहे वो किसी भी आदमी या पशु / पक्षी की बात हो, इन सभी के शरीर की प्रत्येक कोशिका मृत्यु के खिलाफ संघर्ष करती है! अपने जीवन में करुणामय लाइफस्टाइल एवम सकारात्मक सोच को अपनाये जिससे आपके जीने का ढंग ही मुश्किल समय में कवच बनकर आपकी रक्षा करेगा। 

कोरोना एक मानव निर्मित बायोलॉजिकल वायरस है जो कि विश्व के आर्थिक स्पर्धा में हुई बेईमानियों के कारण तैयार किया गया था। इससे लड़ते हुए जिन्होंने अपनी जान गंवा दी, वे सभी योद्धा की तरह हैं। इनकी दिव्य आहुति एक करुणामय विश्व के निर्माण के लिए हम सबको अभिप्रेरित करती है! एक ऐसा विश्व जो सम्पूर्ण जनमानस औऱ पशु-पछियों के प्रति करुणामय हो, जो प्राकृतिक संसाधनों का दोहन न करें, जो बायो-डाइवर्सिटी और पर्यावरण संतुलन को बनाए रखे...जो अनाक्रामक, प्रेम-पूर्ण और सृजनशील विश्व हो! अंत में यह कहूंगा कि इस महामारी में जिन्होंने अपनों को खोया है, उन सभी के पास..सभी की संवेदना और संबल पहुंचे! वे सब आगामी विश्व निर्माण के अग्रदूत हैं, उनके बलिदान को पूरी मानवता का नमन है!

☘️ वीगन सुदेश

कोविद लॉकडाउन: भारत की एक महान दुविधा!

पिछले एक साल से कोविद काल में खुद को प्रताड़ित करने के लिए एक बड़े पैमाने पर लोगों को सैकड़ों न्यूज़ चैनल्स के माध्यम से कभी थाली, तो कभी घंटी बजाकर ब्रेनवॉश किया गया है। आखिर कब तक आप ये बैठ कर इंतज़ार करते रहेंगे कि सभी चीज़ें पहले जैसी हो जाए? ऐसे समय में सरकार पर गुस्सा करना बिल्कुल ठीक है और इसके खिलाफ आवाज उठाना हम सबके लिए अब ज़रूरी हो चुका है।

भारत की शांति और समृद्धि जिस पर पहले ईश्वरवाद, सेक्युलरवाद, पाखंडवाद, जातिवाद की ग्रहण थी वो अब कोविद काल में सरकार के बवेकूफियों के कारण औंधे मुंह गिरी अर्थव्यस्था से और भी बुरे ढंग से प्रभावित हो रही है। ग्लोबल पीस इंडेक्स 2020 के अनुसार, 163 देशों की सूची में अपना भारत 139 वें स्थान पर है। लेकिन, इस से भी बुरी बात यह है कि भारत ने वर्ल्ड हैप्पीनेस रिपोर्ट 2021 में 149 देशों में से 139वें स्थान पर है। अर्थात इतनी प्रगति के बाद भी दुनिया में कुछ देशों को छोड़ कर सबसे ज्यादा शांति और समृद्धि की कमी अपने देश में ही है।

एक बड़ा सवाल यह है कि भारत कोविद के संक्रमण और मृत्यु दर में पूरे विश्व मे #1 स्थान पर पहुंच चुका है जिसके कारण पूरे देश में आपातकाल की स्थिति हो गयी है। लेकिन इसके बाद भी पश्चिम बंगाल और कुछ अन्य राज्यों में लाखों लोग चुनावी रैलियों में जुट रहे है। कुंभ के धर्मिक मेले से IPL क्रिकेट तक का आयोजन जारी है।

किन्तु असल बात यह है कि सँक्रमण के बाद लोग Covid 19 के कम पर मानसिक बिमारियों के मरीज ज्यादा बन चुके है। जो अब पूरी तरह से कुछ स्वार्थी तत्वों पर कुछ मदद की आस लगाए बैठे हैं। पर धीरे-धीरे इनके कारण अपने देश में अशांति बढ़ती ही जा रही है। लॉकडाउन में बढ़ते मानसिक विकारों के कारण भारतीय लोगों में करुणा, मैत्री और शांति समाप्त हो रही है और वो पथभ्रष्ट हो कर अशांति, हिंसा, दुश्मनी, निर्दयता, बेरोजगारी और बीमारी की तरफ अग्रसर हो रहे हैं। जो कि देश की अर्थव्यवस्था के लिए जहर है।

पिछले कई हज़ार सालों में इतने बुरे ढंग से अर्थव्यवस्था को तहस-नहस करना शायद ही कभी देखा गया हो। अगर ये चलता रहा तो समय भी करीब आ रहा है जब लोग विरोध करने के लिए नहीं बल्कि कार्रवाई करने के लिए सड़कों पर आएंगे। हमारे मजबूर मीडिया पर हमलोगों को बहुत दया आनी चाहिए जो बाकियों की तरह बस अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं। बलि के बूत बने सरकारी कर्मचारी, मेडिको और पुलिस के लोग, जो इस तथाकथित बीमारी के योद्धा हैं, पर जाने या अनजाने में ये देश की विशाल आबादी के प्रति भ्रष्टाचार और अन्याय को लागू करने का सामान बने हुए हैं।

कोविद काल आने से पूरा भारत देश एक पुलिस राज्य में परिवर्तित हो गया, जो पूरी तरह से एक विशाल देश की महानता को खत्म कर रहा है। पिछले एक साल से हर प्रांत अपनी स्थानीय राजनीति के अनुसार एक पुलिस राज्य के रूप में काम कर रहा है। अब संपूर्ण संघीय व्यवस्था खतरे में दिखाई देती है। बढ़ते पुलिस अत्याचार लोगों पर मानसिक बोझ डाल रहे हैं, जिसने सभी के मन में भय और अत्याचार के लिए जगह बनाई है। ज्यादातर राज्यों की सम्पूर्ण व्यवस्था अब तानाशाही हो चुकी है। अधिकांश पुलिसकर्मी इस संकटग्रस्त समय में निम्न और मध्यम वर्ग के लोगों को बुरी ढंग से अपमानित और पिटाई करते नज़र आ रहे हैं, जहाँ हमारे मजबूर मीडिया के कैमरे बंद हो जाते हैं। आपदा प्रबंधन या महामारी नियंत्रण कानून किस तरह से आम जनता के मानवाधिकारों का उल्लंघन करने का अधिकार पुलिस को देता है ये आम लोग नही समझ पा रहे हैं। आजकल नागरिकों की स्थिति को ब्रिटिश इंडिया की कर्फ्यू की तुलना में ज्यादा खराब माना जा रहा है जहाँ लोगों को दैनिक जीवन में आहार-विहार के लिए सरकारी फरमान की जरूरत नहीं होती थी।

सुदेश
Email: ask@sudesh.org

कृपया मुझ से इस पेज के माध्यम से जुड़ें - facebook.com/hindistani


क्या मानवतावादी होना धर्म विरोधी है?

जीवन के सर्वोत्तम मूल्यों को प्राप्त करने के लिए हमारा धर्म हमेशा से एक माध्यम रहा है। जो कि आदर्श जीवन की प्राप्ति के लिए निर्धारित किए गए मूल्यों (या आदशों) और तकनीकों की व्याख्या के माध्यम से पूरा किया जाता है। इनमें से किसी में भी बदलाव आने से पूरे धर्म की छवि पर असर पड़ता है।

मानवतावाद भी ऐन्थ्रपॉलजी की इस बात को स्वीकार करता है कि हमारा धर्म, संस्कृति और सभ्यता हमलोगों के सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था और प्राकृतिक वातावरण के साथ जुड़ने के कारण एक क्रमिक विकास का परिणाम है।  

आज वैज्ञानिक प्रगति से बनी हमारी जटिल सामाजिक-आर्थिक संरचना की व्यवस्था ने एक ऐसी स्थिति बनाई है जिसके लिए धर्म में व्यावहारिक परिवर्तन की आवश्यकता है। 100% आस्तिकता और "पौराणिक विचारों" पर आधारित पारंपरिक दृष्टिकोणों का समय अब बीत चुका है। दूसरे शब्दों में कहा जाय तो तकनीकी और आर्थिक परिवर्तन ने हमारी पारंपरिक मान्यताओं को पूरी तरह से बाधित कर दिया है। यह स्पष्ट है कि कोई भी धर्म जो डिजिटलाइजेशन के युग में विलुप्त होना पसंद नहीं करेगा, उन्हें अपने अनुयायियों की जरूरतों के अनुसार फिर से व्यस्थापित होना होगा।

मानवीय सेवाओं में व्यक्तिगत भागीदारी के बाद ही जीवन में पूर्णता आती है, यहां ये फ़र्क नही पड़ता कि आप किस प्रकार के धार्मिक मान्यताओं से जुड़े हैं। हम अपने जीवन में पूर्ण संभव विकास को हासिल करने के क्रम में खुशियों के अलावा शांति, समझदारी और आत्मिक सुंदरता को भी खोजते हैं। हम अपनी संस्कृति की समृद्ध विरासत पर भरोसा करते हैं और मानवतावाद की भावना हमें समृद्धि के साथ-साथ बदहाली में भी आराम प्रदान करती है।

हमलोग स्वभाव से सामाजिक हैं और रिश्तों में अर्थ ग्रहण करते हैं। मानवतावादी विचार हमें पारस्परिक देखभाल और क्रूरता-मुक्त जीवन शैली की दुनिया में ले जाते हैं। अंतर-निर्भरता के साथ किसी व्यक्तित्व के साथ का जुड़ाव, हमारे जीवन को समृद्ध करता है। यह हमें दूसरों के जीवन को भी समृद्ध करने के लिए प्रोत्साहित करता है और सभी के लिए अवसर प्राप्त करने की आशा को प्रेरित करता है।

यह विचार करने योग्य होगा कि हम सभी को प्रत्येक व्यक्ति की गरिमा और व्यक्तिगत अधिकार को दूसरों के अधिकारों के अनुरूप रखने की आवश्यकता है। जिससे हम सभी संभव-अनुसार अधिकतम  स्वतंत्रता का आनंद ले सकें। हमें सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था में सुधार लाने की आवश्यकता है, ताकि कोई भी व्यक्ति जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं से वंचित न रहे। इसे प्राप्त करने के लिए हम पूरी तरह से हठधर्मिता, रहस्योद्घाटन, रहस्यवाद या अलौकिक तत्वों पर आधारित मान्यताओं को अस्वीकार करने के लिए बाध्य हैं। 

मानवतावादी होने के नाते, हमारा प्रयास होना चाहिए कि व्यक्तिगत और सामाजिक समस्याओं का हल  केवल तर्क, बुद्धिमता, करुणायुक्त आलोचनात्मक भावना से निकाला जाए, जो सभी जीवित प्राणियों के लिए सहानुभूति रखता हो।

अंत में हमें याद रखना चाहिए कि हमारा जीवन और जिस तरह की दुनिया में हम जीना चाहते हैं, उसकी जिम्मेदारी हमारी और सिर्फ हमारी ही है। मानवीय मूल्यों की ईश्वरीय गारंटी देने का बिजनेस केवल राजनीति द्वारा निर्मित होता है। इस प्रकार हमारे जीवन के प्रवाह में बने रहने के लिए, हम ऐसी अभिलाषा रखते हैं कि - मानवता अपने आप में ही एक सही आधार प्राप्त करने की क्षमता रखती है। 

DM @ fb.com/humanistgroup

Website: humanist.sudesh.org | Email: humanist@sudesh.org

 WhatsApp # 8452036912

अपने आप से ईमानदार होने का क्या मतलब है?

ईमानदारी का असली स्वरूप खुद के साथ ईमानदार होना है। यह एक हर पल का अभ्यास है। अभ्यास इस बारे में सचेत होना है कि आप क्या कर रहे हैं और खुद से पूछना कि आप ऐसा क्यों कर रहे हैं।

हम में से अधिकांश लोगों को कम उम्र से ही अपने आर्थिक-स्तर को बेहतर बनाने के लिए अपनी भावनाओं को दबाना सिखाया जाता है। इसके कारण हमारे मन में खुद के प्रति एक गहरा अविश्वास पैदा होता है। जब आप दूसरों के बनाए नियमों से नहीं बच पाते हैं तो आपकी जिंदगी एक कठपुतली समान बन कर रह जाती है। आप किसी बाहरी प्रोग्रामिंग द्वारा निर्देशित हो कर अपना प्राकृतिक स्वरूप खो देते हैं।

आज की दुनिया का सबसे बड़ा सच है कि भ्रम, झूठ, हिंसा और डिप्रेशन का बहुत बड़े स्तर पर व्यापार हो रहा है। शिक्षित होने के बावजूद भी हमलोग अपने आंतरिक सत्य और करुणा से विच्छिन्न हो चुके हैं। इस करुणा को वापस जाग्रत करने के लिए वीगन और मानवतावादी विचारों के विश्वव्यापी आंदोलन की जरूरत पड़ रही है। तथ्य यह है कि ज्यादातर लोग वास्तव में अब खुद पर भरोसा नहीं करते हैं और अपनी जिम्मेदारी को दूसरे पर थोप देते हैं। स्वछन्द रूप से सोचने और महसूस करने के लिए भी हमें एक तथाकथित विशेषज्ञ की जरूरत पड़ती है। ये एक मुख्य कारण है कि सभी प्रकार के बिज़नेस में मार्केटिंग और विज्ञापन पर निवेश दिन प्रति दिन बढ़ता जा रहा है!

2020 की इस महान डिजिटल क्रांति के साथ हमें अब उस दुनिया की कल्पना करनी चाहिए जहां हम अब सिस्टम द्वारा नियंत्रित नहीं होंगे। कोई आर्थिक असुरक्षा का डर हमारे अंदर नही होगा। जहां हम सभी एक जागृत अवस्था में जीवन व्यतीत कर पाएंगे।  यह महसूस करने के लिए स्वतंत्र होंगे कि हम कौन हैं और आत्माभिव्यक्ति के लिए हर बार हमें अपने दिमाग का सहारा नही लेना पड़ेगा।

इसे कैसे संभव किया जा सकता है?

आप अपने व्यवहार, इरादों और इच्छाओं का अवतार है। खुद के प्रति ईमानदार होने का सही मतलब है खुद को स्पष्ट रूप से देखना, एक सटीक आत्म-धारणा के साथ सामने आना वास्तव में चुनौतीपूर्ण पर सच्चाई का रूप है। इसके लिए 

आपको यह जानना होगा कि जब आप किसी से नहीं मिलते, तो आप कैसा व्यवहार करते हैं - विशेषकर यहाँ अपने आप को आंकने की कोशिश न करें, पसंद और परिवर्तन बाद में भी आ सकते हैं, अभी के लिए केवल दयालु और गैर-निर्णयवादी बनें। 

डिजिटलीकरण के दौर में 'रैट-रेसिंग' रूटीन से निकल कर प्रकृति के साथ ज्यादा से ज्यादा समय बिताएं। अपने नजदीक जानवरों और पक्षियों को सुनने, जानने और पेड़ों, रंगों, आकृतियों, बनावट, पत्तियों आदि को देखने के लिए समय निकालें।

मन से बोलने पर ज्यादा से ज्यादा ध्यान दें। यह आपके अंदर एक ऊर्जा आवृत्ति का संचार करता है जो आपके भीतर प्रतिध्वनित होगा और आपको इमोशनल महसूस कराएगा। शायद इससे आपकी आंखों में आंसू भी आए या आपके होंठों पर मुस्कान आ जाए। दूसरी ओर अगर कोई व्यक्ति अपने एजेंडे के लिए डिज़ाइन किए गए, बनावटी व्यक्तित्व के साथ पूर्वनिर्मित विचारों से बोलता है, तो इसमें बहुत कम ऊर्जा होती है और आमतौर पर यह आपको असंतुष्ट, निराश, क्रोधित, भ्रमित और शक्तिहीन महसूस कराएगा। हिन्दू मायथोलॉजी में इसका अर्थ नमस्ते शब्द से जुड़ा है। जब आप दूसरे के बारे में अच्छा सोचकर कुछ मन से बोलते हैं तो आप इसे महसूस करते हैं। यही कारण है कि खुद के साथ रहने और अपने शरीर में फिर से महसूस करने की शक्ति और दूसरों से अपनी खुद की भावनाओं को समझने की क्षमता बनाने के लिए समय निकालना इतना महत्वपूर्ण है।

वीगन सुदेश

fb.com/humanistgroup

Vegan Sudesh ~ 8452036912 ✉ ask@sudesh.org


उन्नति की एक आदर्श परिभाषा


लॉकडाउन के लंबे महीनों के बाद आर्थिक तंगी, आइसोलेशन और डिप्रेशन से जूझते हुए, दुनिया उन्नति की एक आदर्श परिभाषा की ओर बढ़ रही है। यह मायने नहीं रखता कि आप किस देश, संस्कृति या परिवेश में पैदा हुए हैं लेकिन हम सभी अपना जीवन एक संकटग्रस्त अर्थव्यवस्था में जीते हैं। जिसके कारण, दुनिया के अधिकांश लोग संभवतः किसी न किसी प्रकार की आवश्यकता में एक-दूसरे से मिलते हैं, लेकिन यहां कुछ जरूरतें भी दिल से पूरी होती हैं, जो किसी न किसी तरह से हमसे जुड़ी होती हैं।

विकास का सही अर्थ यह है कि हमें कोई मृत नहीं खाना चाहिए और न ही हमें मृत के रूप में जीना चाहिए। कोई बात नहीं, समस्या चाहे बड़ी हो या छोटी, हमें उन्हें दृढ़ता से मुकाबला करने का अभ्यास करना चाहिए। जब हम में से अधिकांश लोग सफलता की राह पर आगे बढ़ते हैं तो हम अपनी बेहतर परिस्थितियों में खुशी महसूस करते हैं और लंबे समय तक उसमें समा जाते हैं। फिर अचानक जब बदलाव या कोई स्थिति पैदा होती है, तो हम चौंक जाते हैं और उस परंपरा की परवाह किए बिना पीड़ा का अनुभव करते हैं जिसका हमलोग अनुसरण कर रहे हैं। इन बातों ने हमें जीवन की यात्रा में दिल के रिश्ते से जुड़ने का एहसास कराया है।

हम प्रकृति द्वारा अन्य प्राणियों की तरह एक बहुत ही सरल जीवन जीने के लिए बनाए गए हैं लेकिन एक अंधे प्रतियोगिता से प्रभावित होकर, हम सभी जो एक अर्थव्यवस्था का हिस्सा हैं इसे बहुत जटिल बना दिया है। यदि हम किसी भी क्षण जटिलताओं से निपटने के लिए अच्छी तरह से तैयार हैं तो हमलोग किसी भी स्थिति या परिस्थितियां को चारों ओर से मोड़ सकते हैं और इस पर तुरन्त काबू पा सकते हैं।

हमारे लिए यह महत्वपूर्ण है कि हमारे आसपास गुणी लोग हों, जो दयालु और अच्छे हों। हमारा जीवन सिर्फ जरूरतों के भंवर में नहीं उलझना चाहिए। हमें लगातार सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ने का प्रयास करना चाहिए। तब हम सही रास्ते पर चलेंगे और बेहतर और बेहतर बनेंगे।  हमारे अच्छे गुण उभरेंगे और विकसित होंगे और अधिक स्पष्ट होंगे।

वीगन लाइफस्टाइल और फैशन से संबंधित ऐसी और कंटेंट्स पाने के लिए, मेरे पेज @vegansudesh को सब्सक्राइब करें।

Vegan Sudesh   Vegan Sudesh   Vegan Sudesh 

लॉकडाउन लाइफ


दुनिया उथल-पुथल में है और अर्थव्यवस्था ध्वस्त हो चुकी है। यह अब तक का सबसे बड़ा स्वैच्छिक लॉकडाउन  है जिसे हम सभी अपने जीवन में पहली बार अनुभव कर रहे हैं। न्यूज़ चैनलों द्वारा किया गया एक भ्रामक प्रचार, हमारे हेल्थकेअर सिस्टम का कमजोर बुनियादी ढांचा और लॉकडाउन सभी के लिए एक मानसिक त्रासदी के रूप में सामने आया। महामारी पर राजनीति अभी भी जारी है लेकिन दुनिया अब COVID19 को गंभीर खतरा नहीं मानती है।

सरकार की नाकामियों को छिपाने के लिए लॉकडाउन ड्रामा एक अच्छा बहाना है। इस स्तर पर अर्थव्यवस्था को कभी भी बुरी तरह से अस्थिर नहीं किया गया था। कोविद -19 महामारी का दुनिया भर के लोगों की आजीविका पर बहुत बड़ा प्रभाव पड़ा है। अत्यधिक पुलिसिंग सिस्टम, महामारी को नियंत्रित करने के लिए बेवकूफियों से भरे प्रतिबंध, जरूरत से ज्यादा कानूनी हस्तक्षेप ने व्यावसायिक वातावरण को पूरी तरह से नष्ट कर दिया है और दुनिया भर में बड़े पैमाने पर नौकरियों खत्म हो चुकी हैं।

Covid19 वैक्सीन अभी लॉन्च होना बाकी है। शायद ड्रग गिरोह लॉन्च से पहले इस से ज्यादा से ज्यादा फायदे कमाने के कैलकुलेशन में व्यस्त हो लेकिन तथ्य यह है कि सभी चिकित्सा अनुसंधान संगठनों ने स्वीकार किया है कि उनका ज्यादातर परीक्षण त्रुटिपूर्ण और अनिर्णायक रहा है। देश की विशाल जनसंख्या को शिक्षित करके स्वास्थ्य उद्योग में क्रांति लाने का यह सही समय है। यह एक उपयुक्त वक्त है जब WHO, लॉबीस्ट्, हेल्थकेयर बाजार को चलाने वाले फ़ार्मास्युटिकल कंपनियाँ और मांस-डेयरी उद्योग का कच्चा चिट्ठा खोलना जरूरी है जो कि हमारी गरीब आबादी एवम निर्दोष जानवर की हत्या से पैसे कमाते हैं।

लॉकडाउन ने अधिकांश लोगों की खुशियाँ छीन ली है। कई लोगों का मानसिक स्वास्थ्य दिन-प्रतिदिन गिरता जा रहा है। हमें अब आत्मनिर्भर बनते हुए अपने जीवन को सही ट्रैक पर वापस लाने की आवश्यकता है। आइए मान लें कि हम इस नए बदले हुए परिवेश में अपना जीवन फिर से शुरू कर रहे हैं। टेक्नोलॉजी के लगातार उपयोग के साथ खुशहाल जीवन की ओर अग्रसर होने के लिए हमें अब बदले हुए वातावरण में प्यार, करुणा, सम्मान और विश्वास के विटामिन-सी की आवश्यकता है।

हर कोई अब हेल्थ और लाइफस्टाइल के लिए चिंता कर रहा है। गायों और अन्य जानवरों के मांस, मवाद से भरे दूध एवं अन्य डेयरी उत्पादों का सेवन बंद करने का यह सही समय है। इन मासूम जानवरों के दर्द को महसूस करने और अपने अंदर के दर्द को समाप्त करने के लिए खुद से कोई सवाल न करें। सैचुरेटेड फैट का सेवन ना करें क्योंकि ये आपके नसों के लिए बहुत ही हानिकारक है। सावधान रहें, यह आपके दिल के दौरे का कारण हो सकता है। फल-सब्जियों से भरपूर वीगन भोजन को अपनाएं और अपने शरीर में हर जगह उचित रक्त प्रवाह को संतुलित करें।

- सुदेश कुमार
 (वीगन लेखक)

कोरोना काल में जिंदगी को बेहतर कैसे बनायें।


कोरोना काल में आपकी जिंदगी को बेहतर बनाने के लिए मेरे कुछ महत्त्वपूर्ण सुझाव - सुदेश कुमार

📌 1. लाकडाउन में अगर आपका मन बंजारे-सा भटकता रहता है तो इसे भी कुछ समय के लिए सपनों के क्वारिंटाईन में भिजवा दें। जितनी जल्दी हो सके अपने दिमाग में ये बात बैठा लें कि एक पूरी तरह से अलग स्थिति के लिए अनुकूल बनने का प्रयास करना है। इस महामारी के बाद दुनिया लगभग बदल सी गई है, इसलिए हम सबको भी बदलना होगा। जैसा कि डार्विन ने कहा था, ‘‘जो जीवित हैं, वे सबसे मजबूत या सबसे बुद्धिमान नहीं हैं बल्कि अपने पर्यावरण के सबसे अनुकूल हैं।"

📌 2. आपको डेवेलपमेंट के दृष्टिकोण को छोड़कर एक जिंदा रहने की मानसिकता पर खुद को केंद्रित करना होगा, जो आपके ध्यान को समाधानों पर केंद्रित करेगा और इस करोना के विश्वव्यापी आर्थिक कहर को झेलने में आपकी मदद करेगा। यह मानकर आगे चलिए कि आप इस नए बदले हुए वातावरण में अपने जिंदगी को फिर से शुरू कर रहे हैं। यह अपने आप में आपके नौकरी, बिज़नेस और इन्वेस्टमेंट के लिए एक नया अवसर प्रस्तुत करेगा।

Image

📌 3. ये समय घर में खाली बैठ कर टाइम पास करने का नही है। हम में से कुछ लोग घर से काम (wfh) नहीं कर रहे हैं? कोरोना संकट के कारण वो अपने घर पर हैं और अपना काम करने की कोशिश कर रहे हैं। यदि हम इन दो अलग-अलग चीजों के बीच का अंतर को समझेंगे तो ही हम कुछ अच्छा कर पाएँगे।

📌 4. जरुरी चीज़ें अगर आपके पास जरूरत से ज़्यादा है तो इसका मतलब ये है कि आप डर और ग़ुरूर से जकड़े हुए हैं। आप सेनेटाईजेशन को अपनी ज़िंदगी पूरी तरह से अपनाये, लगे हाथ अपने ग़ुरूर को भी सेनेटाईज करवाएँ और डर से हमेशा के लिए छुटकारा पाएँ। नहीं तो नफरतों की नागफनी आपको एक बड़े आइसोलेशन तक ले कर जाएगी।

📌 5. शिक्षा हमें एक बेहतर दुनिया का अधिकार देती है। स्मार्ट फ़ोन उपयोग करके आप शिक्षा से वंचित नही रह सकते है क्योंकि डिजिटलिकरन की दुनिया में आज हमलोग तेज गति से एक फ्री एजुकेशन सिस्टम में प्रवेश कर रहे हैं। यदि आस-पास आस्थाओं के सौदागरों, उनके अंधभक्तों को दवा या वेंटीलेटर की जरूरत हो तो इन्हें मंदिर-मस्जिद-चर्च नहीं बल्कि एक अच्छे अस्पताल में भेजें और एक्सपर्ट से दिखाएँ।

📌 6. इंटरनेट पर भी सोशल  डिस्टेंसिंग का पालन करें, क्योंकि ये ज़्यादातर अनसोशल लोगों का बढ़ता व्यापार है। यहाँ गहराइयों में छिपे संबंध अब सूख रहे हैं। इन्हें किसी एलो-वेरा की रेसिपी या हाईड्रोक्सीक्लोरोक्वीन के वीडियो नहीं बल्कि प्यार और सम्मान चाहिए।

📌 7. वर्षों तक रामायण-महाभारत के झूठे ढोल पीटने वालों पर भी अब विश्वास न करें कि भारत कभी करप्शन-प्रधान देश नहीं था। दूर-दराज के इलाकों से बड़े-बड़े शहरों तक सरकार के भरपूर प्रयासों के बावजूद भी ब्लैकमार्केटिंग एवं कालाबाजारी के कभी नहीं रुकने वाले धंधे से अब परेशान होने की जरूरत नहीं है क्योंकि कुछ महीनों में यह व्हाट्सएप्प के जरिये एक देशी वालमार्ट का हिस्सा बनने जा रहा है।

📌 8. महामारी में स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी के साथ-साथ आजकल हमलोग प्रशासन और पुलिस के दुर्व्यवहार से भी एक बडी जंग लड़ रहे हैं। आप ऐसे समय में पुलिस के साथ समझदारी से निपटना सीखें, जो लोगों को बिना कुछ सुने-समझे धुनाई करना मात्र अपना कर्त्तव्य समझती है। इनकी ज़्यादा बुराई न करें क्योंकि ये हमारे समाज के ही प्रतिलिपि है, जैसी जनता, वैसी पुलिस। ये समय के साथ-साथ ख़ुद सुधरेंगे।

Vegan Sudesh   वीगन सुदेश   Vegan Sudesh 


लॉकडाउन के कारण दिल्ली से मजदुरों का पलायन


इस लॉकडाउन में अचानक रिवर्स माइग्रेशन के बढ़ने से गरीबी से जूझ रहे लाखों मजदूरों को गर्मी के महीने में अपने सिर पर गठरी और बच्चों को लेकर हाईवे पर चलने को मजबूर होना पड़ा तो आज पूरा सरकारी तंत्र लाचार नजर आ रहा है। उनके लाखों-करोड़ों के अनुदान की घोषणा बिल्कुल निरर्थक लगती है। यहाँ हालात से त्रस्त लोग महामारी और गरीबी का सामना एक साथ कर रहे हैं। चरमराती भारतीय अर्थव्यवस्था में रोज कमाने-खाने वालों की नींदें ही नहीं उड़ी, आँसू भी सूख गए। उन्हें रोटी तो कहीं भी मिल जाएगी, दुख इस बात का है कि आज उनके स्वप्निल भविष्य का ठिकाना छीन गया है। अब ना वो घर के रहे, ना घाट के।


In this lockdown, the sudden rise of reverse migration forced the millions of poverty ridden labourers to walk on highway by carrying the bundle of essentials and children on their heads during month of summer. Then the entire government system is seen to be helpless today. The announcement of grant of billions to them seems absolutely meaningless. Here, people plagued by the circumstances are suffering the epidemic and poverty together. In tumbling Indian economy, the daily wage earners have not just lost their sleep, their tears have also dried up. They will get foods anywhere, but sadly whereabouts of their golden future has been taken away in lockdown. Today, they have lost their long earned social respect.

सुदेश कुमार

खाली हाँथ आये थे हम!


Imagine someone, who flew regularly on Jet Airways, had banking with YES Bank, also had a homeloan from DHFL, a real estate investment in a company with IL&FS as a creditor, got shares in Essar Steel and Anil Ambani's Reliance companies... and been a subscriber of Vodafone-Idea mobile phone no. Nowadays, all of above are a victim of extremely bad circumstances.🤔And on top of that, he/she is sitting at Corona Virus infected Wuhan Airport of China, listening to the song  "Khaali haath aaye the hum, khaali haath jaayenge"....😅

कल्पना कीजिए कि कोई, जेट एयरवेज पर नियमित रूप से सफर करने वाला, यस बैंक के साथ बैंकिंग करने वाला, जिसका DHFL से एक होम लोन भी था, जो एक लेनदार के रूप में IL&FS के साथ एक कंपनी में अचल संपत्ति का निवेश करता था और Essar स्टील और अनिल अंबानी की रिलायंस कंपनियों के शेयर में पैसा लगा के बैठा है ... और वोडाफोन-आइडिया का नम्बर उपयोग करता है। आज सभी बहुत बुरे हालात के शिकार हैं और इन सब से ऊपर, वो खुद चीन के क्रोना ग्रस्त वुहान हवाई अड्डे पर बैठकर ये गीत सुन रहा है - "खाली हाँथ आये थे हम, खाली हाँथ जाएंगे .... 🤔।

सुदेश कुमार
यूनिवर्सिटी ऑफ व्हाट्सएप

साल्वेशन और सोशल मीडिया


आज हर स्मार्टफोन उपयोगकर्ता अपने आप में व्यस्त है। जाने-अनजाने में सोशल मीडिया उनको धीरे-धीरे अनसोशल बना रही है। पिछले दो दशकों तक एक प्रभावी परम्परागत सामाजिक व्यवस्था होने के कारण सामान्य लोगों के जीवन में कोई ज्यादा शोध का विषय नही होता था। विकल्पों पर आधारित ख़ुशी को लोग धर्म से जोड़कर देखते थे। उम्र के अंतिम पड़ाव पर लोग ये सोचना शुरू करते थे कि कुछ दशकों के जीवन में उन्हें क्या कुछ नया हासिल करना था और कितना हो पाया। जरूरतों के उलझन में उन्हें सभी कुछ बिकाऊ ही नज़र आता था।

आजकल जिन्दगी की भाग-दौड़ कम हो या ना हो पर अब इसकी दिशा जरूर बदल चुकी है। फ्री-इंटरनेट चैनलस अब समय के प्रबंधन और आकलन की ट्रेनिंग दिला रहे हैं। जिससे ये निर्धारित करना आसान हो जाएगा कि वर्तमान समय से लेकर इस धरती पर बिताये अपने जीवन के आख़िरी क्षण तक हमें क्या कुछ नया करके जाना है।

Image

Nowadays, every smart phone user is busy on its own. Unknowingly, social media is making them more unsocial with time. Till last two decades ago, due to the very influencing traditional society, there was not much subject of research in the lives of ordinary people. People used to associate happiness with choices based on religion. At the last phase of the age, people used to start thinking about what they had to achieve and how much they have achieved in last few decades. Perplexed by the need based life, people used to see everything in terms of money.  

Nowadays life's run-off may or may not be reduced, but now its direction has changed for sure.  Free-Internet channels are now providing training in time management and estimation. Which will make it easy to determine what we have to go through from the present to the last moment of our life spent on this earth.


सुदेश कुमार
@sudeshkumar

बर्ड फ्लू, मैड काऊ और अब कोरोना वायरस


हमारे शास्त्र बोलते हैं कि आहार-विहार का बहुत अधिक गहनता से ध्यान दो। अपने खान-पान को शुद्ध और सात्विक रखो। पर अपनी आदत से मजबूर कुछ पढ़े-लिखे ढोंगी लोगों द्वारा चलाये जा रहे मीडिया ने इसे भेदभाव करने वाले धर्म से जोड़ कर एक राजनीतिक मानसिकता तक बोल दिया और पुराना बोलकर इसका उपहास किया।

आज चीन और अन्य देशों में जानवरों को खाने के कारण पूरा विश्व ऐसे संक्रमण के चपेट में है जो कि लाखों लोगों को चट कर के ही मानेगा। बर्ड फ्लू, मैड काऊ, अब कोरोना वायरस ये सभी बीमारियाँ सिर्फ और सिर्फ माँस भक्षण या गलत आहार से आती रही हैं।

चीन में आज लाखों लोगों को शीशे में कैद कर रख दिया गया है। सरकार उन्हें जिंदा मारने के लिए कोर्ट से आदेश मांग रही है ताकि ये बीमारी ज्यादा न फैले। उनको कोई छू नहीं सकता, उनसे कोई बोल तक नहीं सकता। जिस तरह अपने भोजन के लिए इन्होंने जीवों को यातनायें दी आज वही यातना इनको मनुष्य होकर झेलना पड़ रहा है। 

आज विश्व में एक कैंपेन चल रहा है - शाकाहारी और वीगन लाइफस्टाइल अपनाने का। चीन में सरकार की तरफ से आदेश आ गया है कि बहुतायत में मात्र फल-सब्जियाँ उगायें और उन्हीं का सेवन करें।

"अभी भी वक्त है, शाकाहारी बनिये।"

Image

Our scriptures say that pay close attention to diets and consume only pure and Sattvik foods. But the media, run by some of so called elite people forced by their ill habit, linked it to discriminating religion and promoted this as a political mentality and ridiculed it by saying it an old practice.

Due to eating animals in China and other countries, the whole world is in the grip of such an infection which will be gulping millions of people. Bird flu, Mad Cow and Corona virus, all these diseases burst out in result of eating meat or wrong diet.

Nowadays, millions of people have been imprisoned in glasshouse of China. The government is seeking a court order to kill them alive so that the disease does not spread much. No one can touch them, no one can even speak to them.  Just as they tortured creatures for their food, today they are facing the same torture as human beings.

A campaign is going on in the world - To adopt vegetarian and vegan lifestyle. Recently, the order came from the government in China to grow fruits-vegetables in abundance and consume it instead of eating animals.

"There is still time, go vegan."

सुदेश कुमार
@sudeshkumar

कृपया फोन नंबर के साथ अपना संदेश लिखें

Name

Email *

Message *